कुल पेज दृश्य

रविवार, 10 जुलाई 2016

समसामयिक

आसार नहीं अच्छे दिन के, 
ये केसर क्यारी के दंगल।
नहीं भा रहे सेव बंगीचे, 
बना कुछ दिनों से जंगल। 

विदेश नीतियां ठीक हैं लेकिन, 
राष्ट्रनीति भी जरुरी है।
रक्षक के होते ये हालत, 
कह दो क्या मजबूरी है।

आस हमारी टूट रही अब, 
जो तुमने बंधवाया था।
छप्पन इंची सीना ताने, 
जो नारे लगवाया था।

इक्कीसवीं सदी उज्वल भविष्य, 
क्या अब भी सोच रखेंगे अब? 
नाकारे जब जंगी होंगे, 
क्या कुछ न तोड़ सकेंगे अब? 

                

शनिवार, 9 जुलाई 2016

खुश्बू जानी-पहचानी थी


मुद्दतों बाद वो दिखे मुझे, 
पर अपनों की निगरानी थी, 
खुश्बू जानी-पहचानी थी।

एक दिवस मैं गया था, 
लेने कुछ सामान, 
कोई बगल से गुजरा, 
जिसकी खुश्बू थी आसान। 
आगोश किसी का याद आया, 
मन में अन्तर्नाद हुआ, 
पीछे मुड़कर देखा तो, 
थे अपने नाफ़र्मान।। 

दिल में था प्रेमभाव और
 कदमों की नातवानी थी।
खुश्बू जानी-पहचानी थी।

सोमवार, 27 जून 2016

काव्य समीक्षा

कल 26/06/16 को शामिल की गई मेरी कविता "एकाकी जीवन"  को साहित्यिक बगिया समूह का मिला बहुमूल्य समीक्षात्क अपनापन--

साहित्यिक बगिया दैनन्दिनी पर आज दिनांक 27-06-2016 को  रचनाकार अमरेश गौतम जी दवारा रचित कविता "एकाकी जीवन" लगायी गयी।

पहली रचना पर अशोक मंडल, शिवम शर्मा, गीता पंडित दीदी, स्नेहांशु तिवारी, प्रकाश सिन्हा सर, स्पर्श चौहान,मनोज चौहान, प्रियंका शर्मा, गीतांजलि शुक्ला, डा गायत्री वर्मा,अभिषेक द्विवेदी ,उपेन्द्र सिंह प्रहलाद श्रीमाली ,सुशीला जोशी प्रेरणा गुप्ता, भावना सिंह  विमल चन्द्राकर, नरेश भारती, व कंचन मिश्रा जी ने विचार व्यक्त किये।
सबसे पहले अशोक मंडल जी ने कहा कि छात्र जीवन के अहसासों और अरमानों को समेटे यह कविता बहुत अच्छी बन पड़ी है।कई बार दुःख दर्द अंदर के कुछ ऐसे पत्थरों को तोड़ देता है जिससे अंदर एक निर्झर झरना बहने लगता है। दर्द भी जरुरी है। एकाकी जीवन भी जरुरी है कुछ समय के लिए ताकि आत्ममंथन हो सके। नई सोंच आ सके। नए विचार आ सके। दुःख को क्रिएटिव लोग पॉवर हाउस की तरह इस्तेमाल करते हैं।
शिवम शर्मा व प्रकाश सिन्हा सर ने कहा कि अमरेश जी की रचना कालेज के दिवसों की याद दिला जाती है।
      प्रख्यात कवयित्री गीता पंडित जी रचना को बेहतरीन गीत मानती है।स्नेहांशु तिवारी कविता का स्तर बढिया सिद्ध करते हैं।एकाकी जीवन एक ऐसे समय की अनुभूति या फिर स्मरण है जब कवि अकेला जी रहा होता है, विशेषकर अपने यौवन काल मे जब वो छात्र होता है । ये कविता उस  समय का तुलनात्मक परिचय है इस समय से जब वो  एकेला न होकर  अपने परिवार, सगे संबंधियों के साथ जीवन बिता रहा होता है। 
कविता को पढ़ने के  दौरान  अल्पकाल के लिए मन कॉलेज या स्कूल की स्मृति मे हिलोरे मारने लगता है और सभी संघर्षपूर्ण बातें ,यौवनकाल की  भावनाए मन को   छूने लगती है।बहुत सुंदर कविता अमरेश जी, लेकिन कविता मे उस एकाकी जीवन के सभी पहलू शामिल हुए है, ऐसा मुझे प्रतीत नही होता है ,कविता मे कुछ छूट सा गया है ऐसा पढ़ने पर कई बार प्रतीत होता है।एकाकी जीवन सच में ही दूभर होता है,अतीत चाहे कैसा भी हो उसकी स्मृतियाँ हमेशा मधुर होती हैं । अमरेश जी ने कविता में अपने अनुभवों को सुन्दर तरीके से गुंथा है,,,मुश्किल दौर गुज़र ही जाता है ।
कवि के ह्रदय की टीस दिखाती निम्न पंक्तियाँ दिल को छू-छू जाती हैं :

'बंद पड़ा बेकार किसी
बिना सिग्नल के टावर सा ।'
            मंच की मुख्य एडमिनिस्ट्रेटर प्रियंका शर्मा ने विस्तृत समीक्षा  
करते हुये कहा कि "अापने अपनी कविता में अपने बीते पलों के एहसासों को बेहद सहज सरल ढंग से  सुन्दर शब्दों उकेरने का सार्थक प्रयास किया है, कविता के भाव पाठक वर्ग के ह्रदय पर अपना गहरा प्रभाव डालती हैl"
एकाकी जीवन में जहां एक ओर अपने लक्ष्य प्राप्ति की चिन्ता रहती है वही दूसरी ओर एकांत जीवन अंदर अंदर कुछ कमी सा महसूस करता रहता हैl  यह कविता केवल अपके जीवन की नहीं बल्कि उन तमाम लोगों के लिये भी है जो इस तरह का जीवन जी रहे है l सार्थक कवि वह होता है जिसके भाव में पाठक अपने भाव को महसूस करता है l 
गीतांजलि शुक्ला अभिषेक द्विवेदी व गायत्री जी ने अमरेश भाई की कविता को स्तरीय संज्ञा प्रदान की।
    प्रसिद्ध लेखक व कवि प्रहलाद  श्रीमाली ने कहा कि -"अमरेश जी ने एकाकी जीवन का सहज चित्रण करते हुए अकेलेपन की कसक से छुटकारा पाकर  एकांत का आनंद पाने की प्रेरणा दी है ।"
सुशीला जी गहन दृष्टिकोण से बात को रखती हुये कहती हैं कि "अमरेश जी नेशायद यह कविता आपने अपने उन दिनों में लिखी जब आप न तो एकाकी हैं और न ही  जोड़ो में घूमते हुए लोगो की ओर कोई विशेष आकर्षण ही महसूस करते थे । अगर ऐसा होता तो ये अभिव्यक्तियां नही लिखी जाती । 
 एक विद्यार्थी जीवन की मानसिक , शारीरिक और आर्थिक स्तिथितियो से जूझती व्यवस्था का मार्मिक वर्णन से सराबोर है आपकी कविता।युवा अवस्था में उस अल्हड़पन की भी चर्चा है जो उसके लिए बड़ी चाह बनके उभरती है और विवशता में मनके उहापोह में फस कर रह जाता है । उसी अवस्था के मनोविज्ञान की भी चर्चा है जिसमे कभी वह स्वयं को कभी ऊर्जावान महसूस करता है तो कभी एक मात्र टावर के समान । यही वह समय होता है जब एक युवा जरा सा सम्बल मिल जाने पर हद से आगे कुछ भी कर गुजरने को तैयार रहता है और न मिलने पर टावर की तरह जड़ महसूस करता है ।कविता ऐसे यथार्थ का सामना करती है जो भारत में 98 प्रतिशत विद्यार्थियों की स्थिति का भान कराती है ।
मंच के संचालक विमल चन्द्राकर ने कहा कि "अमरेश जी की रचना जीवन मे अकेलेपन,स्मृतियों से ठस भरे छात्र जीवन के दुर्दंतम संघर्ष की बेहतरीन रचना है।रचनाकार का अध्ययन के दरम्यान प्रारंभिक संघर्ष,मानस पटल पर उभरी नेकानेक कल्पनाये, प्रेमी युगलों पर भाव संप्रेषण काबिले तारीफ दीखता है।जो रचनाकार की परिपक्व भाषा शैली को दर्शाता है।
रचना का शिल्प मंझा हुआ है।
आगे जीवन के लिये सपनों उम्मीदों को सच करने की खूबसूरत कवायद दीखती है।"
प्रेरणा गुप्ता भी एकाकी जीवन को पढकर छात्र जीवन को याद कर जाती हैं।भावना सिंह ने कहा कि अमरदेश जी की रचना पढने के दौर के समय मन में  उठती उमंग आशा निराशा संवेदना (सुख दुख  दोनों को कविता शामिल होते देखना) प्रेम अभिव्यक्ति जैसे अनुभव कविता को बेजोड़ बना देते हैं।कविता मन  करती है।


मंच पर स्वछंदता से विचार रखने हेतु कोटिशः आभार व्यक्त करता हूँ।
                                                          ---विमल चन्द्राकर
                                                     संचालक साहित्यिक बगिया


रविवार, 26 जून 2016

एकाकी जीवन


रह-रह कर अब याद आ रहा,
वो मेरा एकाकी जीवन।


इक कमरे का रहवासी था,
महलों सा एहसास लिए।
स्वयं पकाना खाना पीना,
कभी-कभी उपवास किए।
जन जीवन स्वच्छन्द और जँचता था बेवाकी जीवन,
वो मेरा एकाकी जीवन।


जब तक रहता कामकाज,
तब तक कुछ एहसास नहीं।
फुर्सत में फिर सोचा करता,
सब कुछ अब तक पास नहीं।
रातों को सन्नाटे में डसता था एकाकी जीवन,
वो मेरा एकाकी जीवन।





नव जोड़ों का भ्रमण देखकर,
सपने कितने पाले थे।
प्रणय भाव से दिल पर जैसे,
लगते लाखों भाले थे।
उम्मीदों के भँवर जाल में, कैसे कटेगा बाकी जीवन,
वो मेरा एकाकी जीवन।




भाग दौड़ से भरी जिन्दगी,
हाल हुआ यायावर सा।
बंद पड़ा बेकार किसी,
बिन सिगनल के टावर सा।
बिना पिये मदहोश पड़ा,लगता था क्यों साकी जीवन,
रह-रह कर अब याद आ रहा,वो मेरा एकाकी जीवन॥

बुधवार, 22 जून 2016

अभी तो होश में आया हूँ

न देखिये यूं तिरछी निगाहों से मुझे, 
अभी-अभी तो होश में आया हूँ मैं। 

मदहोश था अब तक उनकी आराईश में यूं, 
लगता था खुद से ही पराया हूँ मैं। 

कुछ पल तो एहसास हो जमाने को मेरे होने का, 
मुद्दत से ही निज स्वार्थ में भरमाया हूँ मैं। 

ये ज़र ये ज़मीं ये सारे एहतमाम, 
अदावत हैं यहीं के वर्ना कहां से लाया हूँ मैं। 

नहीं बाकी मेरे पास खोने को कुछ भी, 
सब कुछ खोकर ही तो तुमको पाया हूँ  मैं।

गुरुवार, 2 जून 2016

चित्र रचना


रविवार, 29 मई 2016

एक शेर

ये ज़र, ये जमीं, ये सारे एहतमाम,
अदावत हैं यहीं के, वरना कहां से लाया था मैं। 

शनिवार, 28 मई 2016

दादू लड़ें सरपंची हमार

आसउं दादू लड़ें सरपंची हमार। 

बड़े शौखि से परचा भरिगा, 
फोटो सोटो खीचिन।
गांउं मेड़उरे चलें परचारी, 
बलभर खरभोटनी खीचिन।

फेरि नहबामां पानी भरिके, 
गांउं के सगलउ कहांर।
आसउं दादू लड़ें.............. 

अठमां पास त रहें बिचारु, 
अउर कुच्छु न जानां।
जइसन जेइ कहं बड़कउने, 
ओहिन क निकहा मानां।

ओनके सरपंची चउचक होइगें, 
गांउं के सगलउ कलार।
आसउं दादू लड़ें.............. 

बड़कउंने जउन रहें परचारी, 
दोहरी चाल चलामां।
खां पियं सब दादू के हमरे, 
औउरन के जुगाड़ करामां।

पता चली जब चाल, 
ददूबा फोरिसि गोड़ कपार।
आसउं दादू लड़ें सरपंची हमार..

                 
                   

शनिवार, 2 अप्रैल 2016

चिंता थी

खुशी मुझे इतनी की बसर हो जाय,
उन्हें महल से घर में एहतमाम की चिंता थी।

हम मिल बांट के गुजर करते हैं अब भी,
उनको सारे घर में निज़ाम की चिंता थी।

जी रहे हैं दोनों ही फर्क बस इतना है,
मुझको हर सुबह उन्हें शाम की चिंता थी।

मिल्कियत उतनी ही कि भूखा न रहे कोई,
मुझको इतनी ही उनको एहतराम की चिंता थी।

                       
                         

शुक्रवार, 1 अप्रैल 2016

ऐ हवा

उनसे मत कहना, कि उन्हें याद किया है,
ऐ हवा उनसे मिलके आना जरुर।

मुझे जुल्फें संवारने का मौका दें ना दें,
कहना हाथों में मेहदी लगाना जरूर।

इक गली, इक मोहल्ले और हौसले का फासला है,
कभी हमारी गली में भी आना जरूर।

रोज़ -रोज़ उनकी गली में ग़र जाउंगा मैं,
किसी को शक हुआ तो बताना जरूर।

कहने के बाद थोड़ा रुक भी जाना 'अयुज'
ग़र कोई सौगात मिले तो लाना जरूर।

                   
                    

शुक्रवार, 25 मार्च 2016

"कारवां रुके नहीं"



संकल्प करके अब,चले हैं इस जहांन में,
पांव न रुकेंगे अब,किसी भी तूफान में।
तठस्थ हो लिखे चलो,कलम ये झुके नहीं,
कारवां रुके नहीं.........

बुराइयों का अगर,कुछ समय तक मान है,
विचलित न हों राह से,अच्छाई से ये जहांन है।
घनघोर अंधेरा भले,दीपक की लौ बुझे नहीं,
कारवां रुके नही
कारवां रुके नही....

                       
                        

मंगलवार, 22 मार्च 2016

होली की शुभकामनाएँ



गुरुवार, 17 मार्च 2016

मुद्दत की बात है



मुस्कान पर कुर्बान था,मुद्दत की बात है, 
कोई हंसी खेल न,मोहब्बत की बात है। 

है पराई वो अगर,तो हैरत की बात क्या, 
इसमें अपना वश नहीं, किस्मत की बात है। 

हम हमारे वादों पे, कायम ही रहेंगे, 
ये कोई बंधन नहीं, चाहत की बात है। 

तेरे ही हुक्म पर हैं, कायम सभी मसले, 
कुछ नहीं बस ये तेरी, शौकत की बात है। 

तू सोच न खुदगर्ज कभी, भूलकर मुझको, 
'अयुज' ये तो मेरी, शहामत की बात है। 

                     
                     

मंगलवार, 15 मार्च 2016

प्राकृतिक आपदा



बस्तियां, महल,नगर उजड़ जाते हैं, 
बसे बसाये मंज़र, उजड़ जाते हैं। 
कुदरत के आगे जोर कहां चलता है, 
आपदा में हर एक, शहर उजड़ जाते हैं। 

इसके लिए कोई रकीब नहीं है, 
शासक नहीं कोई हबीब नहीं है। 
कोप भाजन बनेगा हर कोई इसका, 
इस पर किसी का चलता नसीब नहीं है। 

                         
                          

सोमवार, 14 मार्च 2016

जवाब

बिना गाली-गलौज के उस बद्जबान को मेरा जवाब -

भारत माँ के जयकारे का,
तुझको है कोई ज्ञान नहीं।
तू फर्जों को भूल गया,
चौपाया है इंसान नहीं।

जिस मिट्टी का तिलक लगाकर,
वीर रणों को जाते हैं।
दुश्मन का सीना छलनी कर,
उनसे नारे लगवाते हैं।

मां के अपमानों का सब,
हिसाब चुकाया जाएगा।
इस मिट्टी में ही इक दिन,
तुझको दफनाया जाएगा।

                   
                      

रविवार, 13 मार्च 2016

बचपन


मनुज अवस्था का सबसे, स्वर्णिम दिन है बचपन, 
किसी बात की फिक्र नहीं, हर ग़म से रीता बचपन। 

हर पहलू सिंहासन अपना, 
हर किसी पे तानाशाही। 
अपना हो या बेगाना, 
करता अपनी ही नौकरशाही। 

अपने और पराये में, हर हम में बीता बचपन, 
किसी बात की फिक्र नहीं........... 

पापा ग़र आह्लादित होते, गली-गली टहलाते, 
मम्मी की तो बात ही क्या थी, लोरी गा-गाकर सुनाती सिर सहलाते। 

हर आंचल के स्नेह से, नवनीता बचपन, 
किसी बात की फिक्र नहीं........ 


                     
                       

शुक्रवार, 11 मार्च 2016

भ्रष्टाचार



न डर दुश्मनों से जमाने से न डर, 
डर दुराचार से बुराई से डर। 

नेकी ही तेरी बदी को भगायेगी, 
बचायेगी तुझे कोई मुश्किल जो आयेगी। 
कर सबकी मदद मिल तहेदिल से सबसे, 
यही वो दौलत है जो साथ तेरे जायेगी। 

डर तो किसी अपने की रुसवाई से डर, 
न डर दुश्मनों से न.............. 

भूखे किसी असहाय का मददगार बन, 
दिल न दुखा किसी का न गुनहगार बन। 
वरना न जहन्नुम में भी पनाह मिलेगी, 
मिल के रह सभी से न कभी गुसार बन। 

सच्चे प्यार में पागल किसी फिदाई से डर, 
न डर दुश्मनों से न.......... 

क्यों ये बड़ा राज़ है आज के लिए, 
भ्रष्टाचार अभिशाप है समाज के लिए। 
मिल के सभी ठान लो मिटाना है इसे, 
घातक है ये हर सुराज के लिए। 

कमजोर दीन-हीन की बद्दुआई से डर, 
न डर जमाने से न............... 

                       
                       

मंगलवार, 8 मार्च 2016

फसल



बुधिया ने हर बार की तरह 
इस बार भी 
पूरा खेत बोया था 

लहलहाती फसलों को देख 
न जाने कितने सपने भी बोया 
सपने और फसल एक साथ 
पले और बढ़े भी। 

कभी पके और काटा भी 
किन्तु नहीं मिला तो उचित मूल्य 

और कभी मौसम के मार ने 
काटने का मौका ही नहीं दिया 
शेखी चिल्ली के अरमान 
कभी खेत में ही नष्ट हुए 
कभी खलिहान में 

घर तक कब पहुंचेंगे? 
साकार कब होगें?? 

                     
                       

सोमवार, 7 मार्च 2016

विश्व महिला दिवस के अवसर पर



तुम ही हो श्रृगार धरा का, 
तुमसे है भूमि पावन। 
जगत जननी अयुज तुम्ही हो, 
करुं तुम्हें सौ बार नमन। 

                     
                       

शनिवार, 5 मार्च 2016

भक्ति



मैंने देखा था उस आदमी को 
कुछ नहीं करता था वो 
बस सुबह से ही घर से 
यूँ ही निकल जाता कहीं। 

सब कहते निकम्मा है 
किसी काम का नहीं 
किन्तु उसका घर कौन चलाता है 
वही ना। 

मैंने देखा था एक दिन 
जब सिपाही उसे पकड़कर 
थाने ले जा  रहे थे 
मुझे ही नहीं सबको पता चला 
वो कोई असामाजिक काम करता है। 

नहीं है उसकी हैसियत
 कि वो अच्छाई की आड़ में 
कोई बुरा काम करे
तो 
वो खुलेआम बुरा काम करता है। 

किन्तु पता चला 
वो भी पक्का भक्त था 
उसके जेब में सुन्दर सी 
भगवान की तस्वीर मिली 
जिससे रोज़ सलामती की कामना 
वो भी करता था।

गुरुवार, 3 मार्च 2016

धर्म

हर इंसान का धर्म होता है
धर्म आपसी एकता का
एक मजबूत जोड़ है

समाज में धर्म के नाम पर
बढ़ रहे विरोधाभास
अंधविश्वास और कलह से
पेशानी पर चिंता की लकीरें
हृदय में दर्द सा उठता है

समाज के चंद लोगों ने
आज धर्म को ही कटघरे में
खड़ा कर दिया है
किन्तु इन सबके परे
हमारा एक सर्वश्रेष्ठ और
सनातन धर्म है इन्सानियत का
जो अमिट है
       
                      

मंगलवार, 1 मार्च 2016

ग़ज़ल

मुफलिसी में भी यहाँ, सुकून से हर बशर रहता है,
उन रेशमी परदों की दीवारों से,डर लगता है।

कितनी आजादी है,इन बस्तियों में रहने वालों को,
अमीरों की नगरी में कैदखाने सा,हर घर लगता है।

कितनी मासूमियत है,इनके चेहरे पर देखिए,
महलों वालों का दंभ से,अकड़ा सर लगता है।

वो नहीं समझते इन्हें, बराबरी के काबिल,
'अयुज' उनके शानो-शौकत में, इनका असर दिखता है।

गुरुवार, 25 फ़रवरी 2016

बेटी की विदाई



नये रिस्तों से बंधन, कुछ बेगाने हो गये,
अनजाने अपने हुए, अपने अनजाने हो गये।

जिस आंगन को महसूस किया, अपनापन के भाव से,
नया किस्सा क्या मिला, सब फसाने हो गये।

एहतमाम जिन चीजों का किया, शिद्दत से अब तलक,
मेरे लिए वो ही सब, नजराने हो गये।

चेहरा देखूं मां का या भाई की देखूं शकल,
मेरे लिए आज सब क्यों मनमाने हो गये।

बाबूल कैसी ये रीत, बनाई तुमने 'अयुज'
कि सारे अपने ही पराये, क्यूँ न जाने हो गये।

                          

बुधवार, 24 फ़रवरी 2016

बघेली कविता

मित्रों सुप्रभात,नमस्कार
मेरी एक बघेली कविता पेश कर रहा हूँ, जिन्हें समझ में आया उन्हें मजा आएगा और जिनको समझ में नहीं आएगा उन्हें अउर मजा आएगा 😃😃😃

    पतोहिया बीए पास हइ।

एमे ओमे पास बताइ के, लड़िका के किन्हिन शादी,
बीए पास पतोहिया आई, भइ लड़िका के बरबादी।
उ कुछु कहइ त समझि न पामा, जोर-जोर चिल्लानें,
रोजू-रोजू के लफड़ा देखिके, पापा पर खिसियानें।

कसिके कहिदं दुलही से के ओनका का अकरास हइ।
पतोहिया बीए पास हइ।
           
                     

रविवार, 21 फ़रवरी 2016

आज मुद्दत बाद महफिल में /अमरेश गौतम'अयुज'

आज मुद्दत बाद महफिल में शिरकत किया है कोई,
कि इस नाचीज पे रेहमत किया है कोई।

आज इतना खूबसूरत क्यों लगता है ताज,
रात भर जागकर मेहनत किया है कोई।

उनका खिला सा बदन कितना रुमानी है अभी,
कितनी शिद्दत से हिफाजत किया है कोई।

कितने अजीज ख्वाब देखे थे जिन्दगी के हमने,
मुझसे जुदा करके उनको रुखसत किया है कोई।

दर-दर पर पूँछा होगा मुझ बदनसीब का हाल,
मैं अब न आऊंगा ऐसी नेमत दिया है कोई।

तुम खुश रहो, रहो आबाद तुम 'अयुज',
हर दर पर सजदे में जियारत किया है कोई।