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शुक्रवार, 10 मई 2019

मुक्तक

कोई पुरखों की मिल्कियत बचाना चाहता है।
कोई कुनबे की इज्जत बचाना चाहता है।
हे भगवान रक्षा करना मेरे वतन की अब-
 कौन देश की ताक़त बचाना चाहता है।

मंगलवार, 5 मार्च 2019

मुक्तक

खूबसूरत गौहर ज्यों सीप के अंदर रहता है।
एक मासूम सा इंसान मेरे भी अंदर रहता है।
कभी कवि,कभी कलाकार,कभी अभियंता-
ये छह फुट का शरीर सृजन का घर लगता है।।








Photo of Milford Sound in New Zealand

शुक्रवार, 25 जनवरी 2019

जय भारत



आज ही की तरह अनवरत आवेश हो, 
यूँ ही तीन रंगों का धवल परिवेश हो।

तीन रंगों से सजा कितना जंच रहा यारों, 
सदा सुख-शाँन्ति औ तिरंगा मय देश हो।


एक बार तो कह दो

तुम बेवफा नहीं हो एक बार तो कह दो, 
मुझसे ख़फा नहीं हो एक बार तो कह दो।

तड़पा मैं एक उम्र जिस ग़म से इस कदर, 
उसकी दवा नहीं हो एक बार तो कह दो।

पाया हूँ जबकि राह भटक कर जहाँन में, 
तुम फ़लसफा़ नहीं हो एक बार तो कह दो।

मतलब के आड़ में कभी उजड़े जो आशियाँ, 
तुम ग़मज़दा नहीं हो एक बार तो कह दो।

हर शख्स सियासी है सियासत के दौर में, 
सबसे जुदा नहीं हो एक बार तो कह दो।
रेखा चित्र-अनुप्रिया दीदी

मंगलवार, 3 जनवरी 2017

इरादा अब भी है

इरादा है अभी भी, उनके दीदार का, 
इरादा अब भी है, उनसे प्यार का।

वो मिलेंगे तो पूँछूगा, भुला दिया कैसे मुझको, 
जो एक पल नहीं रहता था, बिना देखे मुझको।
ये वक्त बड़ा काफिर है, इसका भरोसा क्या, 
कब दूर कर दे, कब मिला देश, भरोसा क्या।

इसको नहीं फिकर, किसी भी बाहर का, 
इरादा अब भी है.......... 

बड़े खुश्नुमाँ थे, वो पल, वो दिन, वो रातें, 
जब दिल ने चाहा, हो जाती थीं मुलाकातें।
कहकसाओं के हुजूम में, हसीन थीं रातें, 
उसी आलम में हुआ करती थीं बातें।

इंतजार नहीं रहता, अब उनके इंतजार का, 
इरादा अब भी है........ 

उनके रूखसार का तिल, खुद उन्हें चिढ़ाएगा, 
जब भी वो जालिम, आइना करीब लाएगा।
वो तिल नहीं, प्यार की निशानी है, 
उनको मालूम है, ये किसी की मेहरवानी है।

निशान ये सलामत रहे, मेरे राज़दार का, 
इशारा अब भी है........

शनिवार, 31 दिसंबर 2016

नववर्ष 2017

नई  सुबह से कई उम्मीदों की दरकार थी,
चंद अंकों के सिवा कुछ नहीं बदला।

  सभी मित्रों एवं देशवासियों को नववर्ष की अशेष शुभकामनाएँ।

बुधवार, 21 दिसंबर 2016

नोटबंदी-एक सिलसिला

कैसा विरोधाभास है ये,
खाने के लाले भी हैं,
और तरक्की की बात भी।



       

मंगलवार, 13 दिसंबर 2016

नोटबंदी-एक सिलसिला

जमा पूरी रकम को, कालाधन न कहो साहब,
गरीबों के एक-एक रुपये का,उसी में हिसाब है।
कालाधन तो अब,आप जैसों से निकले हैं,
जो कि हर हाल में, देशहित में खराब है।

      

शनिवार, 3 दिसंबर 2016

नोटबंदी

रहा फैसला निकहा दादू,
होइ गइ चूक समीक्षा मा।
बिन तइयारी बइठी गये हों
कउनउ ऊंचि परीक्षा मां।

जेका कह समर्थन दादू,
ऊत एनकर भाग रहा।
अबहूं लाईन है राज म तोंहरे,
तबउ जब ओंनकर राज रहा।

मानन के हम काम नीक ई,
समय, योजना ठीक नहीं।
बिजली पानी घर के किल्लत,
चलभाष रीति इ ठीक नहीं।

मूलभूत  सुविधन के सगले,
कर व्यवस्था पहिले।
नहीं त अइसन फरमानन से,
जाब समय से पहिले।

बुधवार, 24 अगस्त 2016

शुभ सबेरा मित्रों,
आप सभी को जन्माष्टमी की शुभकामनाएं।
दोस्तों श्रीकृष्ण भगवान मेरे इष्टदेव है। इसलिये उनके प्रति मेरी छोटी सी प्रार्थना —

मथुरा सा घर में,आना प्रभु,
इस गोकुल में खेल, रचाना प्रभु।
मुरलीधर मेरे इष्टदेव,
इस निर्धन को नहीं,भुलाना प्रभु।

        "बोलो कृष्ण कन्हैयालाल की जय"मेरा चलचित्र

मंगलवार, 9 अगस्त 2016

उलाहना

नहीं अच्छे लगते उन वादों जैसे दिन, 
कहां गए वो फरिश्ते जिन्होंने वादे किए थे। 

रविवार, 7 अगस्त 2016

मित्रता दिवस की अनन्त शुभकामनाएँ

दिल में कोई राज हो तो मत छुपाना,
धड़कन-ए-आवाज हो तो मत छुपाना।
मित्रता के हर कयास पर कायम रहूंगा मैं,
गर कोई आगाज़ हो तो मत छुपाना।

                  

सोमवार, 18 जुलाई 2016

गुरू पूर्णिमा

गीली मिट्टी सा था मैं,
जिसने मुझको आकार दिया।
अनसुलझे,अगणित सपनों को,
जिसने मेरे साकार किया।

अच्छे और बुरे का मुझको,
जिनसे है संज्ञान मिला,
गुरू नाम है उनका जग में,
अरु देवों सा सम्मान मिला।

शुक्रवार, 15 जुलाई 2016

तो याद करना

कोई दर्द, कोई चुभन जब हद से गुजर जाए,तो याद करना,
जिन्दगी में कभी जरूरत पड़ जाए,तो याद करना।

बिछड़ते वक्त के ये आखिरी, अल्फाज थे उनके,
जो अब तक सम्भाले रक्खा, यही राज थे उनके।
ये वो पल थे जो,अब तक भुलाये न गये,
मैने छिपाये रक्खा,जो हमराज थे उनके।
उसने तड़प के कह दिया, न बर्बाद करना,
जिन्दगी में कभी जरूरत पड़े,तो याद करना।

उस वक्त इज़्तिराब में, सोचा न गया,
आँसू भी रुखसार का,पोंछा न गया।
उसने छिपाए दर्द,दामन के आड़ में,
मुझसे छुपाया अश्क,समूचा न गया।
गैरों के सामने न,फरियाद करना,
जिन्दगी में कभी जरूरत पड़ जाए,तो याद करना।

रविवार, 10 जुलाई 2016

समसामयिक

आसार नहीं अच्छे दिन के, 
ये केसर क्यारी के दंगल।
नहीं भा रहे सेव बंगीचे, 
बना कुछ दिनों से जंगल। 

विदेश नीतियां ठीक हैं लेकिन, 
राष्ट्रनीति भी जरुरी है।
रक्षक के होते ये हालत, 
कह दो क्या मजबूरी है।

आस हमारी टूट रही अब, 
जो तुमने बंधवाया था।
छप्पन इंची सीना ताने, 
जो नारे लगवाया था।

इक्कीसवीं सदी उज्वल भविष्य, 
क्या अब भी सोच रखेंगे अब? 
नाकारे जब जंगी होंगे, 
क्या कुछ न तोड़ सकेंगे अब? 

                

शनिवार, 9 जुलाई 2016

खुश्बू जानी-पहचानी थी


मुद्दतों बाद वो दिखे मुझे, 
पर अपनों की निगरानी थी, 
खुश्बू जानी-पहचानी थी।

एक दिवस मैं गया था, 
लेने कुछ सामान, 
कोई बगल से गुजरा, 
जिसकी खुश्बू थी आसान। 
आगोश किसी का याद आया, 
मन में अन्तर्नाद हुआ, 
पीछे मुड़कर देखा तो, 
थे अपने नाफ़र्मान।। 

दिल में था प्रेमभाव और
 कदमों की नातवानी थी।
खुश्बू जानी-पहचानी थी।

सोमवार, 27 जून 2016

काव्य समीक्षा

कल 26/06/16 को शामिल की गई मेरी कविता "एकाकी जीवन"  को साहित्यिक बगिया समूह का मिला बहुमूल्य समीक्षात्क अपनापन--

साहित्यिक बगिया दैनन्दिनी पर आज दिनांक 27-06-2016 को  रचनाकार अमरेश गौतम जी दवारा रचित कविता "एकाकी जीवन" लगायी गयी।

पहली रचना पर अशोक मंडल, शिवम शर्मा, गीता पंडित दीदी, स्नेहांशु तिवारी, प्रकाश सिन्हा सर, स्पर्श चौहान,मनोज चौहान, प्रियंका शर्मा, गीतांजलि शुक्ला, डा गायत्री वर्मा,अभिषेक द्विवेदी ,उपेन्द्र सिंह प्रहलाद श्रीमाली ,सुशीला जोशी प्रेरणा गुप्ता, भावना सिंह  विमल चन्द्राकर, नरेश भारती, व कंचन मिश्रा जी ने विचार व्यक्त किये।
सबसे पहले अशोक मंडल जी ने कहा कि छात्र जीवन के अहसासों और अरमानों को समेटे यह कविता बहुत अच्छी बन पड़ी है।कई बार दुःख दर्द अंदर के कुछ ऐसे पत्थरों को तोड़ देता है जिससे अंदर एक निर्झर झरना बहने लगता है। दर्द भी जरुरी है। एकाकी जीवन भी जरुरी है कुछ समय के लिए ताकि आत्ममंथन हो सके। नई सोंच आ सके। नए विचार आ सके। दुःख को क्रिएटिव लोग पॉवर हाउस की तरह इस्तेमाल करते हैं।
शिवम शर्मा व प्रकाश सिन्हा सर ने कहा कि अमरेश जी की रचना कालेज के दिवसों की याद दिला जाती है।
      प्रख्यात कवयित्री गीता पंडित जी रचना को बेहतरीन गीत मानती है।स्नेहांशु तिवारी कविता का स्तर बढिया सिद्ध करते हैं।एकाकी जीवन एक ऐसे समय की अनुभूति या फिर स्मरण है जब कवि अकेला जी रहा होता है, विशेषकर अपने यौवन काल मे जब वो छात्र होता है । ये कविता उस  समय का तुलनात्मक परिचय है इस समय से जब वो  एकेला न होकर  अपने परिवार, सगे संबंधियों के साथ जीवन बिता रहा होता है। 
कविता को पढ़ने के  दौरान  अल्पकाल के लिए मन कॉलेज या स्कूल की स्मृति मे हिलोरे मारने लगता है और सभी संघर्षपूर्ण बातें ,यौवनकाल की  भावनाए मन को   छूने लगती है।बहुत सुंदर कविता अमरेश जी, लेकिन कविता मे उस एकाकी जीवन के सभी पहलू शामिल हुए है, ऐसा मुझे प्रतीत नही होता है ,कविता मे कुछ छूट सा गया है ऐसा पढ़ने पर कई बार प्रतीत होता है।एकाकी जीवन सच में ही दूभर होता है,अतीत चाहे कैसा भी हो उसकी स्मृतियाँ हमेशा मधुर होती हैं । अमरेश जी ने कविता में अपने अनुभवों को सुन्दर तरीके से गुंथा है,,,मुश्किल दौर गुज़र ही जाता है ।
कवि के ह्रदय की टीस दिखाती निम्न पंक्तियाँ दिल को छू-छू जाती हैं :

'बंद पड़ा बेकार किसी
बिना सिग्नल के टावर सा ।'
            मंच की मुख्य एडमिनिस्ट्रेटर प्रियंका शर्मा ने विस्तृत समीक्षा  
करते हुये कहा कि "अापने अपनी कविता में अपने बीते पलों के एहसासों को बेहद सहज सरल ढंग से  सुन्दर शब्दों उकेरने का सार्थक प्रयास किया है, कविता के भाव पाठक वर्ग के ह्रदय पर अपना गहरा प्रभाव डालती हैl"
एकाकी जीवन में जहां एक ओर अपने लक्ष्य प्राप्ति की चिन्ता रहती है वही दूसरी ओर एकांत जीवन अंदर अंदर कुछ कमी सा महसूस करता रहता हैl  यह कविता केवल अपके जीवन की नहीं बल्कि उन तमाम लोगों के लिये भी है जो इस तरह का जीवन जी रहे है l सार्थक कवि वह होता है जिसके भाव में पाठक अपने भाव को महसूस करता है l 
गीतांजलि शुक्ला अभिषेक द्विवेदी व गायत्री जी ने अमरेश भाई की कविता को स्तरीय संज्ञा प्रदान की।
    प्रसिद्ध लेखक व कवि प्रहलाद  श्रीमाली ने कहा कि -"अमरेश जी ने एकाकी जीवन का सहज चित्रण करते हुए अकेलेपन की कसक से छुटकारा पाकर  एकांत का आनंद पाने की प्रेरणा दी है ।"
सुशीला जी गहन दृष्टिकोण से बात को रखती हुये कहती हैं कि "अमरेश जी नेशायद यह कविता आपने अपने उन दिनों में लिखी जब आप न तो एकाकी हैं और न ही  जोड़ो में घूमते हुए लोगो की ओर कोई विशेष आकर्षण ही महसूस करते थे । अगर ऐसा होता तो ये अभिव्यक्तियां नही लिखी जाती । 
 एक विद्यार्थी जीवन की मानसिक , शारीरिक और आर्थिक स्तिथितियो से जूझती व्यवस्था का मार्मिक वर्णन से सराबोर है आपकी कविता।युवा अवस्था में उस अल्हड़पन की भी चर्चा है जो उसके लिए बड़ी चाह बनके उभरती है और विवशता में मनके उहापोह में फस कर रह जाता है । उसी अवस्था के मनोविज्ञान की भी चर्चा है जिसमे कभी वह स्वयं को कभी ऊर्जावान महसूस करता है तो कभी एक मात्र टावर के समान । यही वह समय होता है जब एक युवा जरा सा सम्बल मिल जाने पर हद से आगे कुछ भी कर गुजरने को तैयार रहता है और न मिलने पर टावर की तरह जड़ महसूस करता है ।कविता ऐसे यथार्थ का सामना करती है जो भारत में 98 प्रतिशत विद्यार्थियों की स्थिति का भान कराती है ।
मंच के संचालक विमल चन्द्राकर ने कहा कि "अमरेश जी की रचना जीवन मे अकेलेपन,स्मृतियों से ठस भरे छात्र जीवन के दुर्दंतम संघर्ष की बेहतरीन रचना है।रचनाकार का अध्ययन के दरम्यान प्रारंभिक संघर्ष,मानस पटल पर उभरी नेकानेक कल्पनाये, प्रेमी युगलों पर भाव संप्रेषण काबिले तारीफ दीखता है।जो रचनाकार की परिपक्व भाषा शैली को दर्शाता है।
रचना का शिल्प मंझा हुआ है।
आगे जीवन के लिये सपनों उम्मीदों को सच करने की खूबसूरत कवायद दीखती है।"
प्रेरणा गुप्ता भी एकाकी जीवन को पढकर छात्र जीवन को याद कर जाती हैं।भावना सिंह ने कहा कि अमरदेश जी की रचना पढने के दौर के समय मन में  उठती उमंग आशा निराशा संवेदना (सुख दुख  दोनों को कविता शामिल होते देखना) प्रेम अभिव्यक्ति जैसे अनुभव कविता को बेजोड़ बना देते हैं।कविता मन  करती है।


मंच पर स्वछंदता से विचार रखने हेतु कोटिशः आभार व्यक्त करता हूँ।
                                                          ---विमल चन्द्राकर
                                                     संचालक साहित्यिक बगिया


रविवार, 26 जून 2016

एकाकी जीवन


रह-रह कर अब याद आ रहा,
वो मेरा एकाकी जीवन।


इक कमरे का रहवासी था,
महलों सा एहसास लिए।
स्वयं पकाना खाना पीना,
कभी-कभी उपवास किए।
जन जीवन स्वच्छन्द और जँचता था बेवाकी जीवन,
वो मेरा एकाकी जीवन।


जब तक रहता कामकाज,
तब तक कुछ एहसास नहीं।
फुर्सत में फिर सोचा करता,
सब कुछ अब तक पास नहीं।
रातों को सन्नाटे में डसता था एकाकी जीवन,
वो मेरा एकाकी जीवन।





नव जोड़ों का भ्रमण देखकर,
सपने कितने पाले थे।
प्रणय भाव से दिल पर जैसे,
लगते लाखों भाले थे।
उम्मीदों के भँवर जाल में, कैसे कटेगा बाकी जीवन,
वो मेरा एकाकी जीवन।




भाग दौड़ से भरी जिन्दगी,
हाल हुआ यायावर सा।
बंद पड़ा बेकार किसी,
बिन सिगनल के टावर सा।
बिना पिये मदहोश पड़ा,लगता था क्यों साकी जीवन,
रह-रह कर अब याद आ रहा,वो मेरा एकाकी जीवन॥

बुधवार, 22 जून 2016

अभी तो होश में आया हूँ

न देखिये यूं तिरछी निगाहों से मुझे, 
अभी-अभी तो होश में आया हूँ मैं। 

मदहोश था अब तक उनकी आराईश में यूं, 
लगता था खुद से ही पराया हूँ मैं। 

कुछ पल तो एहसास हो जमाने को मेरे होने का, 
मुद्दत से ही निज स्वार्थ में भरमाया हूँ मैं। 

ये ज़र ये ज़मीं ये सारे एहतमाम, 
अदावत हैं यहीं के वर्ना कहां से लाया हूँ मैं। 

नहीं बाकी मेरे पास खोने को कुछ भी, 
सब कुछ खोकर ही तो तुमको पाया हूँ  मैं।

गुरुवार, 2 जून 2016

चित्र रचना


रविवार, 29 मई 2016

एक शेर

ये ज़र, ये जमीं, ये सारे एहतमाम,
अदावत हैं यहीं के, वरना कहां से लाया था मैं। 

शनिवार, 28 मई 2016

दादू लड़ें सरपंची हमार

आसउं दादू लड़ें सरपंची हमार। 

बड़े शौखि से परचा भरिगा, 
फोटो सोटो खीचिन।
गांउं मेड़उरे चलें परचारी, 
बलभर खरभोटनी खीचिन।

फेरि नहबामां पानी भरिके, 
गांउं के सगलउ कहांर।
आसउं दादू लड़ें.............. 

अठमां पास त रहें बिचारु, 
अउर कुच्छु न जानां।
जइसन जेइ कहं बड़कउने, 
ओहिन क निकहा मानां।

ओनके सरपंची चउचक होइगें, 
गांउं के सगलउ कलार।
आसउं दादू लड़ें.............. 

बड़कउंने जउन रहें परचारी, 
दोहरी चाल चलामां।
खां पियं सब दादू के हमरे, 
औउरन के जुगाड़ करामां।

पता चली जब चाल, 
ददूबा फोरिसि गोड़ कपार।
आसउं दादू लड़ें सरपंची हमार..

                 
                   

शनिवार, 2 अप्रैल 2016

चिंता थी

खुशी मुझे इतनी की बसर हो जाय,
उन्हें महल से घर में एहतमाम की चिंता थी।

हम मिल बांट के गुजर करते हैं अब भी,
उनको सारे घर में निज़ाम की चिंता थी।

जी रहे हैं दोनों ही फर्क बस इतना है,
मुझको हर सुबह उन्हें शाम की चिंता थी।

मिल्कियत उतनी ही कि भूखा न रहे कोई,
मुझको इतनी ही उनको एहतराम की चिंता थी।

                       
                         

शुक्रवार, 1 अप्रैल 2016

ऐ हवा

उनसे मत कहना, कि उन्हें याद किया है,
ऐ हवा उनसे मिलके आना जरुर।

मुझे जुल्फें संवारने का मौका दें ना दें,
कहना हाथों में मेहदी लगाना जरूर।

इक गली, इक मोहल्ले और हौसले का फासला है,
कभी हमारी गली में भी आना जरूर।

रोज़ -रोज़ उनकी गली में ग़र जाउंगा मैं,
किसी को शक हुआ तो बताना जरूर।

कहने के बाद थोड़ा रुक भी जाना 'अयुज'
ग़र कोई सौगात मिले तो लाना जरूर।

                   
                    

शुक्रवार, 25 मार्च 2016

"कारवां रुके नहीं"



संकल्प करके अब,चले हैं इस जहांन में,
पांव न रुकेंगे अब,किसी भी तूफान में।
तठस्थ हो लिखे चलो,कलम ये झुके नहीं,
कारवां रुके नहीं.........

बुराइयों का अगर,कुछ समय तक मान है,
विचलित न हों राह से,अच्छाई से ये जहांन है।
घनघोर अंधेरा भले,दीपक की लौ बुझे नहीं,
कारवां रुके नही
कारवां रुके नही....